India El Nino Monsoon Risk: एल नीनो के बढ़ते असर से मानसून पर खतरा, खेती और पानी की चिंता बढ़ी

Bihar News
By -
0
India El Nino Monsoon Risk: एल नीनो के बढ़ते असर से मानसून पर खतरा, खेती और पानी की चिंता बढ़ी

भारत में मानसून के बीच अब एल नीनो (El Nino) का खतरा एक बार फिर चर्चा में है। भारत मौसम विज्ञान विभाग

 (IMD) और कई वैश्विक मौसम मॉडल संकेत दे रहे हैं कि प्रशांत महासागर में कमजोर एल नीनो की स्थिति बनी

 हुई है। इसके आने वाले हफ्तों में और मजबूत होने की संभावना है। इसका असर भारत के दक्षिण-पश्चिम मानसून

 पर पड़ सकता है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि जुलाई के दूसरे हिस्से में मध्य और दक्षिण भारत के कई

 इलाकों में बारिश कम रह सकती है।


क्या है एल नीनो?

एल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है। इसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री पानी

 सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। यह बदलाव दुनिया के कई देशों के मौसम को प्रभावित करता है।


भारत में एल नीनो का सीधा संबंध अक्सर कमजोर मानसून से माना जाता है। हालांकि हर बार ऐसा होना जरूरी

 नहीं है। कई अन्य मौसम प्रणालियां भी मानसून को प्रभावित करती हैं। इनमें इंडियन ओशन डाइपोल (IOD),

 मैडन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) और बंगाल की खाड़ी में बनने वाले कम दबाव के क्षेत्र शामिल हैं।


IMD ने क्या कहा?

भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार फिलहाल कमजोर एल नीनो की स्थिति बनी हुई है। विभाग का कहना है कि

 दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान इसके और मजबूत होने की संभावना है।


IMD के ताजा पूर्वानुमान में यह भी कहा गया है कि जुलाई के मध्य तक मध्य भारत और दक्षिण भारत के कई

 हिस्सों में बारिश की गतिविधियां सामान्य से कम रह सकती हैं। इसका असर खेती और जल भंडारण पर पड़

 सकता है।


कई राज्यों में बारिश की कमी

पिछले कुछ दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों में मौसम का अलग रूप देखने को मिला है।


पूर्वी और उत्तर-पूर्वी राज्यों में भारी बारिश जारी है। वहीं महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और केरल के

 कई हिस्सों में बारिश कमजोर पड़ने लगी है। पश्चिमी घाट के कुछ इलाकों में भी सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई

 है।

मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति "ब्रेक मानसून" जैसी हो सकती है। इस दौरान कुछ हिस्सों में बारिश

 लगभग रुक जाती है जबकि दूसरे क्षेत्रों में तेज वर्षा जारी रहती है।


किसानों के लिए बढ़ी चिंता


भारत की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है। देश के लाखों किसान आज भी सिंचाई के लिए मानसून पर भरोसा करते

 हैं।


अगर जुलाई और अगस्त में बारिश कम होती है तो खरीफ फसलों पर असर पड़ सकता है। धान, सोयाबीन,

 कपास, मक्का और दालों की बुवाई प्रभावित हो सकती है।


कुछ राज्यों में किसान पहले ही बुवाई में देरी का सामना कर रहे हैं। कई जगह खेतों में पर्याप्त नमी नहीं होने से

 बुवाई धीमी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द अच्छी बारिश नहीं हुई तो उत्पादन पर असर पड़ सकता

 है।


पानी की उपलब्धता पर भी असर


कम बारिश का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहता।


यदि मानसून कमजोर रहता है तो बांधों में पानी कम जमा होता है। इससे पीने के पानी की उपलब्धता प्रभावित हो

 सकती है। जलविद्युत उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।


शहरों और गांवों में आने वाले महीनों में जल संकट बढ़ने की आशंका रहती है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां पहले से

 ही भूजल का स्तर नीचे है।


क्या पूरे देश में सूखे जैसी स्थिति बनेगी?


फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी।


भारत जैसे बड़े देश में मानसून हर क्षेत्र में समान नहीं होता। कई बार एल नीनो के बावजूद कुछ राज्यों में सामान्य

 या उससे अधिक बारिश दर्ज की गई है।


विशेषज्ञों का कहना है कि बंगाल की खाड़ी में बनने वाले कम दबाव के सिस्टम यदि सक्रिय रहते हैं तो कई इलाकों

 में अच्छी बारिश हो सकती है। इसी तरह यदि इंडियन ओशन डाइपोल अनुकूल बना रहता है तो एल नीनो के

 असर को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।


किन राज्यों पर ज्यादा नजर?

मौसम विभाग विशेष रूप से महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, केरल और मध्य भारत के कई हिस्सों की

 निगरानी कर रहा है।


इन राज्यों में अगले कुछ दिनों तक बारिश सामान्य से कम रहने की संभावना जताई गई है। दूसरी ओर बिहार,

 झारखंड, पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और ओडिशा में भारी से बहुत भारी बारिश का अनुमान

 है।


तापमान भी बढ़ा रहा चिंता


जहां बारिश कम हो रही है वहां तापमान भी सामान्य से ऊपर दर्ज किया जा रहा है।


तमिलनाडु के कई हिस्सों में हाल के दिनों में गर्म और उमस भरा मौसम बना हुआ है। मौसम विभाग के अनुसार

 कमजोर मानसून के कारण दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में गर्मी का असर बढ़ा है।


सरकार और एजेंसियां क्या कर रही हैं?


केंद्र और राज्य सरकारें लगातार मौसम की स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।


मौसम विभाग नियमित पूर्वानुमान जारी कर रहा है। कृषि वैज्ञानिक किसानों को सलाह दे रहे हैं कि वे स्थानीय

 मौसम की जानकारी के आधार पर फसल प्रबंधन करें। जरूरत पड़ने पर कम पानी वाली फसलों और कम अवधि

 में तैयार होने वाली किस्मों को अपनाने की सलाह भी दी जा रही है।


विशेषज्ञों की राय


मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि केवल एल नीनो को देखकर पूरे मानसून का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।


आज मौसम पूर्वानुमान पहले की तुलना में अधिक उन्नत हो चुका है। सैटेलाइट, समुद्री आंकड़े और आधुनिक

 जलवायु मॉडल लगातार स्थिति का विश्लेषण कर रहे हैं।


इसलिए आने वाले सप्ताहों में यदि समुद्री और वायुमंडलीय परिस्थितियों में बदलाव होता है तो मानसून की स्थिति

 भी बदल सकती है। यही कारण है कि मौसम विभाग समय-समय पर अपने पूर्वानुमान अपडेट करता रहता है।


आगे क्या उम्मीद?


अभी मानसून का बड़ा हिस्सा बाकी है। जुलाई और अगस्त भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानसूनी महीने माने

 जाते हैं।


यदि इस दौरान पर्याप्त बारिश होती है तो शुरुआती कमी की भरपाई हो सकती है। लेकिन यदि एल नीनो का असर

 और मजबूत हुआ तथा बारिश लगातार कम रही तो खेती, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता

 है।


फिलहाल मौसम विभाग लोगों से आधिकारिक मौसम बुलेटिन पर नजर रखने और अफवाहों से बचने की अपील

 कर रहा है। आने वाले दो से तीन सप्ताह भारत के मानसून की दिशा तय करने में काफी अहम माने जा रहे हैं।

Post a Comment

0 Comments

Post a Comment (0)
4/related/default